Monday, 26 September 2016

एकादशी तिथि को चावल खाना मना क्यों है

एकादशी तिथि को चावल खाना मना क्यों है

वर्ष की चौबीसों एकादशियों में चावल न खाने की सलाह दी जाती है। ऐसा माना गया है कि इस दिन चावल खाने से प्राणी रेंगने वाले जीव की योनि में जन्म पाता है, किन्तु द्वादशी को चावल खाने से इस योनि से मुक्ति भी मिल जाती है। एकादशी के विषय में शास्त्र कहते हैं, ‘न विवेकसमो बन्धुर्नैकादश्या: परं व्रतं’यानी विवेक के सामान कोई बंधु नहीं है और एकादशी से बढ़ कर कोई व्रत नहीं है। पांच ज्ञान इन्द्रियां, पांच कर्म इन्द्रियां और एक मन, इन ग्यारहों को जो साध ले, वह प्राणी एकादशी के समान पवित्र और दिव्य हो जाता है। एकादशी जगतगुरु विष्णुस्वरुप है, जहां चावल का संबंध जल से है, वहीं जल का संबंध चंद्रमा से है। पांचों ज्ञान इन्द्रियां और पांचों कर्म इन्द्रियों पर मन का ही अधिकार है। मन ही जीवात्मा का चित्त स्थिर-अस्थिर करता है। मन और श्वेत रंग के स्वामी भी चंद्रमा ही हैं, जो स्वयं जल, रस और भावना के कारक हैं, इसीलिए जलतत्त्व राशि के जातक भावना प्रधान होते हैं, जो अक्सर धोखा खाते हैं। एकादशी के दिन शरीर में जल की मात्र जितनी कम रहेगी, व्रत पूर्ण करने में उतनी ही अधिक सात्विकता रहेगी। महाभारत काल में वेदों का विस्तार करने वाले भगवान व्यास ने पांडव पुत्र भीम को इसीलिए निर्जला एकादशी (वगैर जल पिए हुए) करने का सुझाव दिया था। आदिकाल में देवर्षि नारद ने एक हजार वर्ष तक एकादशी का निर्जल व्रत करके नारायण भक्ति प्राप्त की थी। वैष्णव के लिए यह सर्वश्रेष्ठ व्रत है।
चंद्रमा मन को अधिक चलायमान न कर पाएं, इसीलिए व्रती इस दिन चावल खाने से परहेज करते हैं। एक और पौराणिक कथा है कि माता शक्ति के क्रोध से भागते-भागते भयभीत महर्षि मेधा ने अपने योग बल से शरीर छोड़ दिया और उनकी मेधा पृथ्वी में समा गई। वही मेधा जौ और चावल के रूप में उत्पन्न हुईं। ऐसा माना गया है कि यह घटना एकादशी को घटी थी। यह जौ और चावल महर्षि की ही मेधा शक्ति है, जो जीव हैं। इस दिन चावल खाना महर्षि मेधा के शरीर के छोटे-छोटे मांस के टुकड़े खाने जैसा माना गया है, इसीलिए इस दिन से जौ और चावल को जीवधारी माना गया है। आज भी जौ और चावल को उत्पन्न होने के लिए मिट्टी की भी जरूत नहीं पड़ती। केवल जल का छींटा मारने से ही ये अंकुरित हो जाते हैं। इनको जीव रूप मानते हुए एकादशी को भोजन के रूप में ग्रहण करने से परहेज किया गया है, ताकि सात्विक रूप से विष्णुस्वरुप एकादशी का व्रत संपन्न हो सके।
चावल और जौ के रूप में महर्षि मेधा उत्पन्न हुए इसलिए चावल और जौ को जीव माना जाता है। जिस दिन महर्षि मेधा का अंश पृथ्वी में समाया, उस दिन एकादशी तिथि थी। इसलिए एकादशी के दिन चावल खाना वर्जित माना गया। मान्यता है कि एकादशी के दिन चावल खाना महर्षि मेधा के मांस और रक्त का सेवन करने जैसा है।
वैज्ञानिक तथ्य के अनुसार चावल में जल तत्व की मात्रा अधिक होती है। क्योंकि चावल की खेती पूरी पानी मे होती है ! इसलिए इसमे पानी का प्रभाव अधिक होता है ! और जल पर चन्द्रमा का प्रभाव अधिक पड़ता है। क्योंकि जल को अग्नि का विपरीत माना गया ! और चंद्रमाँ को सूर्य का विपरीत इसलिए चंद्रमा का प्रभाव जल पर अधिक होता है ! ह चावल खाने से शरीर में जल की मात्रा बढ़ती है इससे मन विचलित और चंचल होता है। कारण-चंद्र का संबंध जल से है। वह जल को अपनी ओर आकर्षित करता है यदि व्रती चावल का भोजन करे तो चंद्रकिरणें उसके शरीर के संपूर्ण जलीय अंश को तरंगित करेंगी। परिणाम जिस एकाग्रता से उसे व्रत के अन्य कर्म-स्तुति पाठ, जप, श्रवण करने होगे. उन्हें सही प्रकार से नहीं कर पाएगा।मन के चंचल होने से व्रत के नियमों का पालन करने में बाधा आती है। एकादशी व्रत में मन का निग्रह और सात्विक भाव का पालन अति आवश्यक होता है इसलिए एकादशी के दिन चावल से बनी चीजें खाना वर्जित कहा गया है

राहू कि महादशा में नवग्रहों कि अंतर्दशाओं का फल एवं उपाय

राहू कि महादशा में नवग्रहों कि अंतर्दशाओं का फल एवं उपाय

🔛राहु मूलतः छाया ग्रह है, फिर भी उसे एक पूर्ण ग्रह के समान ही माना जाता है। यह आद्र्रा, स्वाति एवं शतभिषा नक्षत्र का स्वामी है।

राहु की दृष्टि कुंडली के पंचम, सप्तम और नवम भाव पर पड़ती है। जिन भावों पर राहु की दृष्टि का प्रभाव पड़ता है, वे राहु की महादशा में अवश्य प्रभावित होते हैं।
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राहु की महादशा 18 वर्ष की होती है🔯🔯🔯🔯🔯🔯🔯 राहु में राहु 
की अंतर्दशा का काल 2 वर्ष 8 माह और 12 दिन का होता है। इस अवधि में राहु से प्रभावित जातक को अपमान और बदनामी का सामना करना पड़ सकता है। विष और जल के कारण पीड़ा हो सकती है। विषाक्त भोजन, से स्वास्थ्य प्रभावित हो सकता है। इसके अतिरिक्त अपच, सर्पदंश, परस्त्री या पर पुरुष गमन की आशंका भी इस अवधि में बनी रहती है। अशुभ राहु की इस अवधि में जातक के किसी प्रिय से वियोग, समाज में अपयश, निंदा आदि की संभावना भी रहती है। किसी दुष्ट व्यक्ति के कारण उस परेशानियों का भी सामना करना पड़ सकता है।

🔯उपाय:

भगवान शिव के रौद्र अवतार भगवान भैरव के मंदिर में रविवार को शराब चढ़ाएं और तेल का दीपक जलाएं।
शराब का सेवन कतई न करें।
लावारिस शव के दाह-संस्कार के लिए शमशान में लकड़िया दान करें।
अप्रिय वचनों का प्रयोग न करें
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🔯राहु में बृहस्पति:🔯

राहु की महादशा में गुरु की अंतर्दशा की यह अवधि दो वर्ष चार माह और 24 दिन की होती है।

राक्षस प्रवृत्ति के ग्रह राहु और देवताओं के गुरु बृहस्पति का यह संयोग सुखदायी होता है। जातक के मन में श्रेष्ठ विचारों का संचार होता है और उसका शरीर स्वस्थ रहता है। धार्मिक कार्यों में उसका मन लगता है। यदि कुंडली में गुरु अशुभ प्रभाव में हो, राहु के साथ या उसकी दृष्टि में हो तो उक्त फल का अभाव रहता है। ऐसी स्थिति में निम्नांकित उपाय करने चाहिए।

किसी अपंग छात्र की पढ़ाई या इलाज में सहायता करें।
शैक्षणिक संस्था के शौचालयों की सफाई की व्यवस्था कराएं।
शिव मंदिर में नित्य झाड़ू लगाएं।
पीले रंग के फूलों से शिव पूजन करें।
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🔯राहु में शनि:🔯

राहु में शनि की अंतदर्शा का काल 2 वर्ष 10 माह और 6 दिन का होता है। इस अवधि में परिवार में कलह की स्थिति बनती है। तलाक भाई, बहन और संतान से अनबन, नौकरी में या अधीनस्थ नौकर से संकट की संभावना रहती है। शरीर में अचानक चोट या दुर्घटना के दुर्योग, कुसंगति आदि की संभावना भी रहती है। साथ ही वात और पित्त जनित रोग भी हो सकता है।

दो अशुभ ग्रहों की दशा-अंतर्दशा कष्ट कारक हो सकती है। इससे बचने के लिए निम्न उपाय अवश्य करने चाहिए।

भगवान शिव की शमी के पत्रों से पूजा और शिव सहस्रनाम का पाठ करना चाहिए।

महामृत्युंजय मंत्र के जप स्वयं, अथवा किसी योग्य विद्वान ब्राह्मण से कराएं। जप के पश्चात् दशांश हवन कराएं जिसमें जायफल की आहुतियां अवश्य दें।
नवचंडी का पूर्ण अनुष्ठान करते हुए पाठ एवं हवन कराएं।
काले तिल से शिव का पूजन करें।♋♋♋♋♋♋♋♋♋♋♊♋♋♋♋♋♋v

🔯🔯🔯राहु में बुध:🔯🔯🔯

राहु की महादशा में बुध की अंतर्दशा की अवधि 2 वर्ष 3 माह और 6 दिन की होती है। इस समय धन और पुत्र की प्राप्ति के योग बनते हैं। राहु और बुध की मित्रता के कारण मित्रों का सहयोग प्राप्त होता है। साथ ही कार्य कौशल और चतुराई में वृद्धि होती है। व्यापार का विस्तार होता है और मान, सम्मान यश और सुख-समृद्धि की प्राप्ति होती है।

उपाय: 

भगवान गणेश को शतनाम सहित दूर्वाकुंर चढ़ाते रहें।
हाथी को हरे पत्ते, नारियल गोले या गुड़ खिलाएं।
कोढ़ी, रोगी और अपंग को खाना खिलाएं।
पक्षी को हरी मूंग खिलाएं।♋♋♋♋♋♌♌♌♌♌♌♌♋♋♋♋
🔱🔱🔱🔱🔱राहु में केतु:🔯🔯🔯🔯🔯

राहु की महादशा में केतु की यह अवधि शुभ फल नहीं देती है। एक वर्ष और 18 दिन की इस अवधि के दौरान जातक को सिर में रोग, ज्वर, शत्रुओं से परेशानी, शस्त्रों से घात, अग्नि से हानि, शारीरिक पीड़ा आदि का सामना करना पड़ता है। रिश्तेदारों और मित्रों से परेशानियां व परिवार में क्लेश भी हो सकता है।

उपाय: 

भैरवजी के मंदिर में ध्वजा चढ़ाएं। कुत्तों को रोटी, ब्रेड या बिस्कुट खिलाएं।
कौओं को खीर-पूरी खिलाएं।
घर या मंदिर में गुग्गुल का धूप करें।
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🔱🔱🔱🔱🔱राहु में शुक्र:🔯🔯🔯🔯🔯

राहु की महादशा में शुक्र की प्रत्यंतर दशा पूरे तीन वर्ष चलती है। इस अवधि में शुभ स्थिति में दाम्पत्य जीवन में सुख मिलता है। वाहन और भूमि की प्राप्ति तथा भोग-विलास के योग बनते हैं। यदि शुक्र और राहु शुभ नहीं हों तो शीत संबंधित रोग, बदनामी और विरोध का सामना करना पड़ सकता है। इस अवधि में अनुकूलता और शुभत्व की प्राप्ति के लिए

सांड को गुड़ या घास खिलाएं।
शिव मंदिर में स्थित नंदी की पूजा करें और वस्त्र आदि दें।
एकाक्षी श्रीफल की स्थापना कर पूजा करें।
स्फटिक की माला धारण करें।♋♋♋♋♋♋♋♋♋♋♋♋♋♋♋♋♋
🔱🔱🔱🔱🔱🔱राहु में सूर्य:🔯🔯🔯🔯🔯

राहु की महादशा में सूर्य की अंतर्दशा की अवधि 10 माह और 24 दिन की होती है, जो अन्य ग्रहों की तुलना में सर्वाधिक कम है। इस अवधि में शत्रुओं से संकट, शस्त्र से घात, अग्नि और विष से हानि, आंखों में रोग, राज्य या शासन से भय, परिवार में कलह आदि हो सकते हैं। सामान्यतः यह समय अशुभ प्रभाव देने वाला ही होता है।
उपाय:

इस अवधि में सूर्य को अघ्र्य दें। उनका पूजन एवं उनके मंत्र का नित्य जप करें।
हरिवंश पुराण का पाठ या श्रवण करते रहें।
चाक्षुषोपनिषद् का पाठ करें।
सूअर को मसूर की दाल खिलाएं।🔛🔛🔛🔛🔛🔛🔛🔛🔛🔛🔛🔛🔛🔛
🔱🔱🔱🔱🔱राहु में चंद्र:🔯🔯🔯🔯🔯🔯

एक वर्ष 6 माह की इस अवधि में जातक को असीम मानसिक कष्ट होता है। इस अवधि में जीवन साथी से अनबन, तलाक या मृत्यु भी हो सकती है। लोगों से मतांतर, आकस्मिक संकट एवं जल जनित पीड़ा की संभावना भी रहती है। इसके अतिरिक्त पशु या कृषि की हानि, धन का नाश, संतान को कष्ट और मृत्युतुल्य पीड़ा भी हो सकती है।

उपाय:

राहु और चंद्र की दशा में उत्पन्न होने वाली विषम परिस्थितियों से बचने के लिए माता की सेवा करें।
माता की उम्र वाली महिलाओं का सम्मान और सेवा करें।
प्रत्येक सोमवार को भगवान शिव का शुद्ध दूध से अभिषेक करें।
चांदी की प्रतिमा या कोई अन्य वस्तु मौसी, बुआ या बड़ी बहन को भेंट करें।🔜🔜🔜🔜🔜🔜🔜🔜🔜🔜🔜🔜🔜
🔱🔱🔱🔱🔱राहु में मंगल:🔯🔯🔯🔯🔯

राहु की महादशा में मंगल की अंतर्दशा का यह समय एक वर्ष 18 दिन का होता है। इस काल में शासन व अग्नि से भय, चोरी, अस्त्र शस्त्र से चोट, शारीरिक पीड़ा, गंभीर रोग, नेत्रों को पीड़ा आदि हो सकते हैं। इस अवधि में पद एवं स्थान परिवर्तन तथा भाई को या भाई से पीड़ा की संभावना भी रहती है।
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उपाय 
रामरक्षास्तोत्र के 3पाठ सूर्यास्त के बाद नियमित करें
हनुमान जी को चोला चढायें

सोमवार व्रत कथा

सोमवार व्रत कथा का महात्म्य

सोमवार भगवान शिव का दिन माना जाता है। मान्यता है कि जो व्यक्ति सोमवार के दिन भगवान शिव की पूजा उनका व्रत करते हैं उन्हें मनोवांछित फल अवश्य मिलता है।

सोमवार व्रत कथा

एक समय की बात है, किसी नगर में एक साहूकार रहता था. उसके घर में धन की कोई कमी नहीं थी लेकिन उसकी कोई संतान नहीं थी इस कारण वह बहुत दुखी था. पुत्र प्राप्ति के लिए वह प्रत्येक सोमवार व्रत रखता था और पूरी श्रद्धा के साथ शिव मंदिर जाकर भगवान शिव और पार्वती जी की पूजा करता था.
उसकी भक्ति देखकर एक दिन मां पार्वती प्रसन्न हो गईं और भगवान शिव से उस साहूकार की मनोकामना पूर्ण करने का आग्रह किया. पार्वती जी की इच्छा सुनकर भगवान शिव ने कहा कि 'हे पार्वती, इस संसार में हर प्राणी को उसके कर्मों का फल मिलता है और जिसके भाग्य में जो हो उसे भोगना ही पड़ता है.' लेकिन पार्वती जी ने साहूकार की भक्ति का मान रखने के लिए उसकी मनोकामना पूर्ण करने की इच्छा जताई. माता पार्वती के आग्रह पर शिवजी ने साहूकार को पुत्र-प्राप्ति का वरदान तो दिया लेकिन साथ ही यह भी कहा कि उसके बालक की आयु केवल बारह वर्ष होगी. माता पार्वती और भगवान शिव की बातचीत को साहूकार सुन रहा था. उसे ना तो इस बात की खुशी थी और ना ही दुख. वह पहले की भांति शिवजी की पूजा करता रहा.कुछ समय के बाद साहूकार के घर एक पुत्र का जन्म हुआ. जब वह बालक ग्यारह वर्ष का हुआ तो उसे पढ़ने के लिए काशी भेज दिया गया. साहूकार ने पुत्र के मामा को बुलाकर उसे बहुत सारा धन दिया और कहा कि तुम इस बालक को काशी विद्या प्राप्ति के लिए ले जाओ और मार्ग में यज्ञ कराना. जहां भी यज्ञ कराओ वहां ब्राह्मणों को भोजन कराते और दक्षिणा देते हुए जाना.
दोनों मामा-भांजे इसी तरह यज्ञ कराते और ब्राह्मणों को दान-दक्षिणा देते काशी की ओर चल पड़े. रात में एक नगर पड़ा जहां नगर के राजा की कन्या का विवाह था. लेकिन जिस राजकुमार से उसका विवाह होने वाला था वह एक आंख से काना था. राजकुमार के पिता ने अपने पुत्र के काना होने की बात को छुपाने के लिए एक चाल सोची.
साहूकार के पुत्र को देखकर उसके मन में एक विचार आया. उसने सोचा क्यों न इस लड़के को दूल्हा बनाकर राजकुमारी से विवाह करा दूं. विवाह के बाद इसको धन देकर विदा कर दूंगा और राजकुमारी को अपने नगर ले जाऊंगा. लड़के को दूल्हे के वस्त्र पहनाकर राजकुमारी से विवाह कर दिया गया. लेकिन साहूकार का पुत्र ईमानदार था. उसे यह बात न्यायसंगत नहीं लगी.
उसने अवसर पाकर राजकुमारी की चुन्नी के पल्ले पर लिखा कि 'तुम्हारा विवाह तो मेरे साथ हुआ है लेकिन जिस राजकुमार के संग तुम्हें भेजा जाएगा वह एक आंख से काना है. मैं तो काशी पढ़ने जा रहा हूं.'
जब राजकुमारी ने चुन्नी पर लिखी बातें पढ़ी तो उसने अपने माता-पिता को यह बात बताई. राजा ने अपनी पुत्री को विदा नहीं किया जिससे बारात वापस चली गई. दूसरी ओर साहूकार का लड़का और उसका मामा काशी पहुंचे और वहां जाकर उन्होंने यज्ञ किया. जिस दिन लड़के की आयु 12 साल की हुई उसी दिन यज्ञ रखा गया. लड़के ने अपने मामा से कहा कि मेरी तबीयत कुछ ठीक नहीं है. मामा ने कहा कि तुम अंदर जाकर सो जाओ.
शिवजी के वरदानुसार कुछ ही देर में उस बालक के प्राण निकल गए. मृत भांजे को देख उसके मामा ने विलाप शुरू किया. संयोगवश उसी समय शिवजी और माता पार्वती उधर से जा रहे थे. पार्वती ने भगवान से कहा- स्वामी, मुझे इसके रोने के स्वर सहन नहीं हो रहा. आप इस व्यक्ति के कष्ट को अवश्य दूर करें.
जब शिवजी मृत बालक के समीप गए तो वह बोले कि यह उसी साहूकार का पुत्र है, जिसे मैंने 12 वर्ष की आयु का वरदान दिया. अब इसकी आयु पूरी हो चुकी है. लेकिन मातृ भाव से विभोर माता पार्वती ने कहा कि हे महादेव, आप इस बालक को और आयु देने की कृपा करें अन्यथा इसके वियोग में इसके माता-पिता भी तड़प-तड़प कर मर जाएंगे.
माता पार्वती के आग्रह पर भगवान शिव ने उस लड़के को जीवित होने का वरदान दिया. शिवजी की कृपा से वह लड़का जीवित हो गया. शिक्षा समाप्त करके लड़का मामा के साथ अपने नगर की ओर चल दिया. दोनों चलते हुए उसी नगर में पहुंचे, जहां उसका विवाह हुआ था. उस नगर में भी उन्होंने यज्ञ का आयोजन किया. उस लड़के के ससुर ने उसे पहचान लिया और महल में ले जाकर उसकी खातिरदारी की और अपनी पुत्री को विदा किया.
इधर साहूकार और उसकी पत्नी भूखे-प्यासे रहकर बेटे की प्रतीक्षा कर रहे थे. उन्होंने प्रण कर रखा था कि यदि उन्हें अपने बेटे की मृत्यु का समाचार मिला तो वह भी प्राण त्याग देंगे परंतु अपने बेटे के जीवित होने का समाचार पाकर वह बेहद प्रसन्न हुए. उसी रात भगवान शिव ने व्यापारी के स्वप्न में आकर कहा- हे श्रेष्ठी, मैंने तेरे सोमवार के व्रत करने और व्रतकथा सुनने से प्रसन्न होकर तेरे पुत्र को लम्बी आयु प्रदान की है. इसी प्रकार जो कोई सोमवार व्रत करता है या कथा सुनता और पढ़ता है उसके सभी दुख दूर होते हैं और समस्त मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं.

Sunday, 25 September 2016

 सुनीथा को मिली अपने शाप से मुक्ति

जब सुनीथा को मिली अपने शाप से मुक्ति

सुनीथा मृत्यु देवता की पुत्री थी। बचपन से ही वह देखती आ रही थी कि उसके पिता धार्मिकों को सम्मान देते हैं और पापियों को दण्ड। सहेलियों के साथ खेलने में प्राय: वह इन्हीं बातों अनुकरण किया करती थी। एक बार वह सहेलियों के साथ खेलती हुई दूर निकल गयी। वहां एक सुंदर गंधर्व कुमार सरस्वती की आराधना में लीन था। उस पर दृष्टि पड़ते ही सुनीथा उस पर कोड़े बरसाने लगी। भोलेपन से इसे वह खेल ही समझती रही। वह प्रतिदिन आती और निरपराध गंधर्व कुमार को सताती। एक दिन गंधर्व कुमार को क्रोध हो गया, वह बोला - ‘भले लोग मारने वाले को मारते नहीं और गाली देने वाले को गाली नहीं देते। यहीं धर्म की मर्यादा है।’ सुनीथा में सत्यवादिता आदि सभी गुण कूट-कूटकर भरे थे। उसने अपने पिता से सारी घटना ज्यों की त्यों सुना दी। भोली होने से वह गंधर्व कुमार की बातें समझ न पाती थी, उन्हें समझाने के लिए उसने पिता जी से आग्रह किया। मृत्यु ने अपनी पुत्री की जिज्ञासा पर चुप्पी साध ली, जो अच्छी न थी। पुराण ने इसे ‘दोष’ माना है, क्योंकि मारनेवाले को मारना नहीं चाहिए और गाली देने वाले को गाली नहीं देनी चाहिए - इन वाक्यों का अर्थ जो बच्ची नहीं समझ पाती और अभिभावक से समझना चाहती है, उसे न समझना अवश्य अनर्थकारक हो सकता है। हुआ भी ऐसा ही पिता के चुप्पी साध लेने से सुनीथा का वह पापचार रुका नहीं। सखियों के साथ गंधर्व कुमार के पास जाना और कोड़ों से उसे पीटना उसका प्रतिदिन का कार्य हो गया। एक दिन गंधर्वकुमार ने शाप देते हुए कहा - ‘विवाह हो जाने पर तुम्हारे गर्भ से ऐसा पुत्र उत्पन्न होगा जो देवताओं एवं ब्राह्मणों की निंदा किया करेगा और घोर पापाचार में लग जाएंगा।’ इस बार भी सुनीथा ने सच-सच बातें पिता को सुना दी। शाप की बात सुनकर पिता को बहुत दु:ख हुआ। उन्होंने इस बार समझाया - ‘निर्दोश तपस्वी को पीटना अच्छा काम नहीं है। ऐसा तुमने क्यों किया ? अत: अब तुम पुम्य - कर्मों का अनुष्ठान करो, सत्संगति करो और विष्णु के ध्यान में लग जाओ।’ वयस्क होने पर पिता को सुनीथा के विवाह की चिंता हुईं। वे अपनी कन्या को साथ लेकर देवताओं और मुनियों के पास गए। सबका एक ही उत्तर था - ‘इससे जो संतान होगी, वह भयानक पापी होगी। अत: हम इसे स्वीकार न करेंगे।’ इस तरह शाप के कारण सुनीथा का विवाह ही रुक गया। अब तपस्या के अतिरिक्त सुनीथा के पास और कोई उपाय न था। वह पिता की आज्ञा से वन में जाकर तपस्या करने लगी, किंतु चिंता उसका पिण्ड छोड़ना नहीं चाहती थी। रम्भा आदि अप्सराएं सुनीथा की सखियां थीं। वे उसकी सहायता के लिए आ पहुंची। उन्होंने सुनीथा को ढाढ़स बंधाया। रंभा ने उसे पुरुषों को मोहित करने वाली विद्या दी। सुनीथा ने उसका अच्छा अभ्यास कर लिया। जब वह विद्या सिद्ध हो गयी तब सखियां सुनीथा को लेकर वर की खोज में निकल पड़ीं। ढूंढ़ते ढूंढ़ते वे गंगा के तट पर पहुंची। वहां सुनीथा की दृष्टिअंग नामक रूपवान, तेजस्वी अत्रिमुनि के पुत्र पर पड़ी जो वहां तपस्या कर रहे थे, उन्हें देखते ही सुनीथा मोहित हो गयी। रंभा तो यहीं चाहती थी। रंभा उस तपस्वी के इतिहास से सुपरिचित थी, जानती थी कि अत्रि - पुत्र अंग इंद्र के समान वैभवशाली और विष्णु के समान पुत्र के पाने का वरदान पा चुका है। हो सकता था कि इस वरदान के प्रभाव से सुनीथा को मिला शाप प्रभावहीन हो जाएं। अत: सुनीथा का उस पर मोहित होना उसे बहुत अच्छा लगा। अब रहा उस ब्राह्मणकुमार का सुनीथा पर आसक्त होना,  वह तो सुनीथा के लिए बाएं हाथ का खेल था, क्योंकि यह विद्या उसे सिद्ध थी। रंभा ने माया का भी प्रयोग किया। सुनीथा तो अत्यंत रूपवती थी ही, रंभा की माया ने उसमें और चार चांद लगा दिए। सुनीथा झूले पर बैठकर संगीत गाने लगी। सुनते ही अंग का ध्यान टूट गया। वे खिंचे हुए से स्वर के उद्गम की ओर बढ़ते चले गए। सुनीथा पर जब उनकी दृष्टि पड़ी तो उनके हाथ - पैर शिथिल हो आएं। वे तन मन से उसे चाहने लगे और अपने को संभाल कर बोले - ‘सुंदरी ! तुम कौन हो ?’ सुनीथा चुप रही। रंभा आगे आकर बोली - महोदय ! यह मृत्यु की कन्या है। इसमें सब शुभ लक्षण मिलते हैं। यह पति की खोज में निकली है। हम लोग इसकी सखियां हैं। रंभा के अनुकूल वचन सुनकर अत्रिकुमार अंग को बहुत संतोष हुआ। उन्होंने अपने पवित्र कुल की प्रशंसा की और बतलाया कि मैंने विष्णु भगवान से यह वरदान प्राप्त कर लिया है कि मुझे ‘इंद्र सा ऐश्वर्यशाली और विष्णु के समान विश्व का पालन करने वाला पुत्र प्राप्त हो, किंतु योग्य कन्या न मिलने से अब तक मैंने विवाह नहीं किया है। यह कुलीन कन्या यदि मुझे ही वरण कर ले तो इसे अदेय वस्तु भी दे सकता हूं।’ रंभा तो यहीं चाहती थी, अत: बोली - ‘हमलोग भी योग्य वर की ही खोज में हैं। यदि आप चाहते हैं तो सुनीथा आपकी धर्मभार्या बन रही है, किंतु याद रखें,  आप इससे सदा प्यार करते रहें, इसके दोष-गुणों पर कभी ध्यान न दें। आप इस बात का प्रत्यक्ष विश्वास दिलाइये। इस बात की प्रतीति के लिए अपना हाथ सुनीथा के हाथ में दीजिये।’ अंग को रंभा की ये बातें भगवान के वरदान की तरह प्रिय लग रही थीं। उन्होंने अपना हाथ सुनीथा के हाथ पर रख दिया। इस तरह दोनों को गांधर्व विवाह के द्वारा जोड़कर रंभा बहुत संतुष्ट हुई और विदा मांग कर अपनी सखियों के साथ घर वापस आ गयी। वरदान के प्रभाव से सुनीथा का पुत्र सभी लक्षणों से सम्पन्न हुआ। पुत्र का नाम वेन रखा गया। अत्रि के वंश के अनुरूप इस बच्चे ने वेद, दर्शन आदि सारी विद्याओं में निपुणता प्राप्त कर ली। धनुर्वेद में भी यह निष्णात हो गया। वेन में अद्भुत तेज था। आचार - विचार में कोई उसकी समता नहीं कर पाता था। उस समय वैवस्वत मन्वंतर था। राजा के बिना प्रजा को कष्ट होने लगा था। विश्वभर में वेन का प्रभाव उद्दीप्त था। वेन के समकक्ष और कोई तरुण न था। सबने मिलकर उसे प्रजापति के पद पर प्रतिष्ठित कर दिया। वेन के राज्य में चतुर्दिक सुख - शांति प्रतिष्ठित हो गयी। सभी संतुष्ट और सुखी थे। धर्म की उत्तरोत्तर वृद्धि होती जा रही थी। बहुत दिनों से गंधर्व रुमार का शाप वेन पर अपना प्रभाव प्रकट करना चाह रहा था, किंतु अनुकूल परिस्थिति न पाकर दबा हुआ था। संयोग से वेन की एक घोर नास्तिक से भेंट हो गयी। इस संसर्ग से शाप को पनपने का अवसर मिल गया। नास्तिकता का प्रभाव उस पर उत्तरोत्तर बढ़ता चला गया। थोड़े ही दिनों में वेन घोर नास्तिक बन बैठा। वेद, पुराण, स्मृति आदि शास्त्र उसे जाल ग्रंथ दिखने और ब्राह्मण बहुत बड़े वञ्चक। माता - पिता के सामने सिर झुकाना भी उसे बुरा लगने लगा। वेन समर्थ तो था ही , उसने संपूर्ण वैदिक क्रिया कलापों पर रोक लगा दी। राज्य में धर्म का लोप हो गया। पाप जोरों से बढ़ने लगा। पिता अंग अपने पुत्र का यह घोर अत्याचार देखकर बहुत दु:खी हो गये। उनकी समझ में नहीं आ रहा था कि भगवान विष्णु का वह वरदान विफल कैसे हो रहा है ! वे शाप की बात नहीं जानते थे। सुनीथा सब बातें समझ तो रही थी, किंतु उसे खोलना नहीं चाहती थी। अत्रिकुमार अंग ने पुत्र को समझा - बुझाकर रास्ते पर लाना चाहा, पर उन्हें सफलता नहीं मिली। इसी बीच सप्तर्ष आये। अब वरदान को चेतने का अवसर आ गया था। सप्तर्षियों ने बहुत प्यार से वेन को समझाते हुए कहा - ‘वेन ! दु:साहस छोड़ दो। अपने पुराने रास्ते पर आ जाओ। सारी जनता तुम पर अवलंबित है। धर्म के पथ पर लौट आओ और प्रजा पर अत्याचार करना बंद कर दो।’ किंतु अहंकार की मूर्ति वेन ने सप्तर्षियों को फटकारते हुए कहा - ‘मैं ज्ञानियों का ज्ञानी हूं। विश्व का ज्ञान मेरा ही ज्ञान है। जो मेरी आज्ञा के विरुद्ध चलता है, उसे मैं कठोर दण्ड देता हूं। आप लोग भी मेरा भजन करें।’ ऋषियों ने जब वेन के इस रोग को असाध्य समझा और उसके पाप को बलपूर्वक निकालना चाहा, तब झट उन्होंने वेन को पकड़ लिया और उसके बायें हाथ को भलीभांति मथा। फलस्वरूप इस हाथ से एक काला - कलूटा और नाटा पुरुष उत्पन्न हुआ। उस पुरुष के रूप में वेन का सब पाप निकल गया। यह देख ऋषि बहुत प्रसन्न हुए। अब उन्होंने वेन के दाहिने हाथ को मथा। इससे अपने वरदान को फलीभूत करने के लिए भगवान विष्णु ही पृथु के रूप में प्रकट हुए। पाप के निकलते ही वेन की नास्तिकता भी पूरी तरह निकल गयी थी। सप्तर्षियों की कृपा से वेन ने अपनी पहली अवस्था प्राप्त कर ली थी। वे नर्मदा के तट पर चले गये। तृणविंदु के आश्रम में रहकर उन्होंने घोर तपस्या की। भगवान ने उन्हें दर्शन दिया और उन्हें आश्वस्त करने के लिए कहा - ‘वत्स ! तुम्हारी मां को जो शाप मिला था, उससे तुम्हारा उद्धार करने के लिए ही मैंने तुम्हारे पिता को सुयोग्य पुत्र प्राप्त होने का वरदान दिया था। अब तुम घर लौट जाओ। पृथु की सहायता से अश्वमेध आदि यज्ञ और विविध दान - उपदान कर मेरे लोक में आना।’